वो कल ही की तो बात थी

Mom Poetry

I have written this poem as a gesture of respect towards my friend’s mother who is no more..

वो कल ही की तो बात थी जब माँ तू मेरे साथ थी,
डाटती धमकाती तो क्या, पर तेरे साये की तो आस थी ,
आज तो रह गई मैं  अकेली, पर खुश हूँ कुछ पल के लिए तो तू मेरे साथ थी ,
वो कल ही की तो बात थी जब माँ तू मेरे साथ थी

वो कल ही की तो बात थी जब तन्हाई मुझसे नाराज़ थी
खुश रहती गाया करती समझौते भरी ज़िन्दगी में भी एक आस थी
आज तो रह गई मैं  अकेली,पर खुश हुँ अकेले रहना सीख गई ,

जो कल तक एक खयालो की बात थी,
वो कल ही की तो बात थी जब तन्हाई मुझसे नाराज़ थी

वो कल ही की तो बात थी जब धूप में भी छाव थी
पड़े पैर में छाले भी तो क्या, उन मुलायम हाथो की तो आस थी
आज तो रह गई मैं  अकेली, अपनी मैं  प्यारी सखी सहेली
वो कल ही की तो बात थी जब धूप में भी छाव थी

वो कल ही की तो बात थी जब दुनिया मेरे साथ थी
आई मुसीबत तो छोड़ गए सब, सबको मनवानी जो अपनी बात थी
वो कल ही की तो बात थी जब दुनिया मेरे साथ थी

वो कल ही की तो बात थी
जब दिल में बहुत सी बात थी, कह देती तो आज यू ना रोती
उस पल में कुछ तो ख़ास बात थी
वो कल ही की तो बात थी जब माँ तू मेरे साथ थी

वो कल ही की तो बात थी जब माँ तू मेरे साथ थी
दूर सही तो क्या, तेरे मिलने की तो आस थी
तेरे हाथो मेजो बात थी -वो क्या हमारी आख़री मुलाकात थी
आज तो रह गई  में अकेली-बिन तेरे हुमे अधुरी
उन लम्हो में जो बात थी जब संग तू मेरे साथ थी
वो कल ही की तो बात थी जब माँ तू मेरे साथ थी।

वो कल ही की तो बात थी
वो कल ही की तो बात थी.

Prerna  Mehrotra

25/5/2014

ITM hostel.

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2 thoughts on “वो कल ही की तो बात थी

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