NGO/CSR Activities

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This poem I dedicated to all those people who are helping the needy someway or the other.

ये दुनिया जो एक शक्ति
के विशवास पर चल रही थी।
उसके आड़े ये पैसा कहाँ से आगया?
दुखो का बादल जैसे गरीबो
के सर पर ही छा गया।
उनकी काबिलियत का रंग भी
किसी के दिल को इस कदर भागया।
CSR/NGO का रूप बन जैसे ईशवर
उनके लिए इस दुनिया में आगया।
किसीका घर है पर कोई अपना नहीं।
किसीका अपना है पर कोई घरोंदा नहीं।
इस कष्ट को भी समझ पाये कुछ लोग वही।
जो निस्वार्थ दान दे सकते हैं किसीको भी कहीं।

Prerna Mehrotra
9/10/2014

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