कहानी दिये की

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अपनों के प्यार के सहारे
जल रहा था एक घर का दिया।
उस रोशिनी को बाट कर फिर
सबने अपना हिस्सा क्यों लिया ?
बटकर वो लॉ जब भुजनेसी लगी।
आई उम्मीद फिर बनकर सगी।
दिए को उसने एक तरकीब बताई
ऐसा कर मिल पायेंगे फिर ये सब भाई।
दिये ने उम्मीद की हर बात मानी।
ऐसा कर निकल गई उस
बेचारी की पूरी जवानी।
उस उम्मीद के साथ ही वो
इस दुनिया से चली गई।
चाहा कर भी नही कर
पाई वो कुछ सही।

Prerna Mehrotra
11/10/2014

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