औरत

 

ये कैसी आवाज़ हैं मुझमे,
जो हल पल मुझसे कुछ कहती हैं??
अपनी ना सुन,तू क्यों हर पल
दूसरों की ख़ुशी में बहती हैं?
अपने हक़ में तू क्यों,
खुल के किसीसे कुछ नहीं कहती है??
दिन रात मेहनत कर तू क्यों
हर दर्द भी ख़ुशी से सहती हैं?
सुन ज़रा, देख तो, तेरी खुद की
धड़कन भी तुझसे कुछ कहती हैं।
तुझे भी खुद की पहचान के लिए
कुछ अनोखा करना हैं।
खुदको आज़मा कर अपने हित में तुझे भी लड़ना हैं।
आगे फिर संभल कर तुझको चलना हैं।
क्योंकि ये दुनियाँ तो औरत के चरित्र पर,
बे बुनियाद,इल्ज़ाम लगाती है।
मुश्किलों में जो साथ दे
वहीं तेरा सच्चा साथी हैं।
अपने को ना पहचान,
तू क्यों दूसरो से उम्मीद लगाती है??
तू है आदी शक्ति, तुझे बस खुदको समझना है।
अपने को भूल, बस तुझे दुनियाँ दारी में ही नहीं उलझना है।

Prerna Mehrotra
13/11/2014

Advertisements

3 thoughts on “औरत

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s