मेरे पापा

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तो क्या हुआ अगर वो मुझे
लोरी गाके नहीं सुलाते।
माँ डाटे कभी तो वही तो
मेरे पक्ष में बोलके उन्हें समझाते।

तो क्या हुआ अगर सामनेसे
वो अपने जस्बातो को छुपाते।
चली जाऊ दूर कभी तो
वही तो फिर कही अकेले में
अपने आसू छुपाते।

तो क्या हुआ अगर उन्हें मेरी निजी
ज़िन्दगी से ज़्यादा मतलब नही।
अनजान बन के ही सही
दिखाते तो वही है रास्ता सही।

तो क्या हुआ अगर वो अपनी
बात रख नहीं पाते।
बिन कहे ही वो इतना कुछ लाते
जिसे हम समेट नहीं पाते।

तो क्या हुआ अगर आज मेरे पास
उनको देने के लिए कुछ नहीं
पर मेरे ये शब्द ही छूलेंगे
उनके दिलको कही।

तो क्या हुआ अगर उन्होंने
मुझे कभी डाटा।
उस डाट से ही तो हटा
जीवन का काटा।

तो क्या हुआ अगर उन्हें प्यार से
मनाना नहीं आता।
उनकी चुप्पी से ही मेरा मन समझ जाता।
उनका प्यार तो समुंदर जैसा गहरा है
कुछ ना कहकर भी बोल जाये
उनका ऐसा चेहरा है।
अपनी बिटिया को बचाने को लगा
उनका हर तरफ पहरा है।

तो क्या हुआ उनके संग मैं
ज़िंदगी भर ना रह पाउंगी।
दूर रह कर भी मैं उनके लिए
वो सारी खुशियाँ लाऊंगी।
जिसके वो हकदार है
क्यूंकि उनकी ये बेटी
बहुत ही होनहार है।

Prerna Mehrotra
10/12/2014

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12 thoughts on “मेरे पापा

  1. Dr. Sunil says:

    Lovely diversity of words, thoughts and situations. Every father would be thrilled to tears to hear this from his daughter. Keep up the good work.

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