मैं क्यों आज भी ऐसी हूँ ??

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बचपन की वो शरारती गूंज,
क्यों आज भी मुझमें बस्ती है।
देख कर मेरी, इन अदाओं को,
ये दुनियाँ भी मुझपे हस्ती है।

बचपन का वो भोला पन,
मुझमें, आज भी कही पनपता है।
रूठ जो जाऊ किसीसे,
तो आज भी वो मेरे मुख पर चमकता है।

बचपन की वो अनदेखी शैतानियाँ,
आज भी वक़्त-वक़्त पर मैं दोहराती हूँ।
अभी भी देखु.जब छोटीसी गुड़िया,
तो मन ही मन में मुस्कुराती हूँ।

बचपन की यादों के साये में,
ना जाने क्यों मैं पनपना चाहतीं हूँ??
बड़े होने के ख्याल से,
ना जाने क्यों अक्सर मैं डर जाती हूँ??

बचपना भरा था बचपन में,
भरा रहेगा, ये यूही, शायद पचपन में,
इन शैतानियों का साया क्या आगे तक जायेगा??
या बढ़ती उम्र के साथ ये पीछे रह जायेगा???

 

Prerna Mehrotra Gupta
1/5/2017

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