सहारा बनु अब उनका

 

SHYAM MAHROTRA JI [ RING CEREMONY ] 10.3सहारा बनू मैं उनका,
जिनका सहारा मैंने कभी पाया था.
अपने बालपन के दरमियाँ,
कितना मैंने,उन्हें सताया था.
उछल कूद कर,
अपनी धुन में, भाग कही मैं जाती थी.
पकड़ी जा हमेशा,
फिर डाट भी मैं ही खाती थी.
उस डाट की समझ,
तब मुझे कहाँ आती थी.
भूल इस दुनियां को,
हर रोज़ मैं वही गलतियां दोहराती थी.
मुझे डाट उनका भी मन भर आता था,
मुझे समझा कर बहुत,
उनका हौसला भी थक जाता था.
फिर ज़िन्दगी की मुश्किलों ने,
मुझे, वो हर एक बात समझाई.
जो उनके संग रहकर भी मैं,समझ ना पाई.
एक नहीं, दो मात पिता का,
मेरे जीवन में सुख आया है.
मुझ ना-समझ को समझा कर,
उन्होंने आजीवन बस पुण्य ही कमाया है.
अब बनके उनकी लाठी,
मैं उन संग चलती जाउंगी.
इस बढ़ती उम्र की चढ़ाई में,
मैं उनकी ढाल बन जाउंगी.
जीवन की गहराइयो का सबक,
मैं उनसे सीखती जाउंगी.
ठोकरों की इस धूल में भी,
मैं उन्हें हस के दिखलाऊँगी.
अफ़सोस कर अंत में,
मैं कुछ और भी कहना चाहती हूँ.
दुखाया है कई बार उनका दिल,
उन यादो को याद कर,
मैं अक्सर अश्क बहाती हूँ.
कहती नहीं बस इस मुख से,
मैं दिल से सबको बे इन्तहा चाहती हूँ.

 

Prerna Mehrotra Gupta
8/5/2017

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