परिंदा

dsc_5395

Source: http://threehundredandsixtysix.files.wordpress.com/2013/06/dsc_5395.jpg

एक परिंदा जब अपनों को छोड़
घर से जा रहा था,
उस पल उसे बहुत रोना आ रहा था।
फिर भी एक नादान बालक के भोलेपन को
देख ,वो मुस्कुरा रहा था।
ऐसे हाल में वो जब घर से चला
उड़ते समय उसका तन भी फिर धूप में जला
उस प्यासे को कही पानी ना मिला।
हाफ्ते हाफ्ते उड़ना चाह,पर उड़ ना पाया।
खाली बैठ देखने लगा
वो अपना मरता हुआ साया।
फिर दूर आकाश से कही काली
घटाओं का बादल छाया।
ये देख उसकी बची हिम्मत ने उसकी
आशाओं को जगाया।
आखिरी सासो के साथ जब अखियाँ
बंद कर रहा था वो।
यकीन होगया था उसे भी अब बच ना पायेगा वो।
जब उन काली घटाओ से बादल बरसा
लगने लगा उसे भी फिर डर सा।
अब जान नहीं थी उसमें,
की मुख खोल, वो पानी पीले।
इस पल को रोक,
फिर एक बार, वो खुल के जीले।
आया एक नादान बालक फिर कही से जिसने
अनजाने में अपने नन्ने कदमों से,
उस परिंदे का मुख खोल दिया
दुबारा जीवन देकर ईश्वर ने भी फिर
उस परिंदे से ख़ुशी से बोल दिया।
क्या तुझे अब समझ में आया?
दूसरे के लिए बस अच्छा सोचना ही काफी है
मुसीबत में जो काम आये
वही तेरा  सच्चा साथी है।

Prerna Mehrotra
12/12/2014

,

Advertisements